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21 Sept 2012

प्यार नें

प्यार नें हमें इतना ग़मगीन कर दिया ऐ निर्दोष,
के अब तो औरों की ख़ुशी में शरीक होने का भी दिल नहीं करता!!

10 May 2012

निराश

ज़िन्दगी से हताश हूँ,
न जाने क्यूँ इतना निराश हूँ,
सब कुछ तो दिया है तूने ऐ खुदा,
खुश क्यूँ नहीं मैं, न जाने क्या है माज़रा |

उठाता हूँ रोज हाथ दुआ में,
झुकाता हूँ शीश तेरे दर में,
इक दुआ तो कबूल कर ऐ खुदा,
खुश क्यूँ नहीं मैं, न जाने क्या है माज़रा ||

8 May 2012

परछाई

मेरी परछाई ही मेरी साथी है
मेरे अस्तित्व की पाती है,
हूँ कहीं भी मैं,
ये हर दम मेरा साथ निभाती है!

1 Feb 2012

ये ज़िन्दगी भी अजीब है, है ना?

ये ज़िन्दगी भी अजीब है, है ना?
जब चाहता हूँ अश्रू, तब ये हँसाती  है,
जब-जब चाहता हूँ हँसना, तब-तब ये रुलाती है!

ये ज़िन्दगी भी अजीब है, है ना?
जिनके दीदार को तरसता है ये दिल,
उनके चेहरे का नूर हमेशा छुपाती है,
जिनसे भागना चाहता हूँ कहीं दूर,
उनकी शक्ल सुबह-शाम दिखलाती है!

ये ज़िन्दगी भी अजीब है, है ना?
जिनके जाना चाहता हूँ करीब,
उनसे दूर ले जाती है,
पर इस  जहन्नुम की सारी मुसीबतों को,
मेरी झोली में ले आती है!

ये ज़िन्दगी भी अजीब है, है ना?
इस अकेले से सफ़र में,
कुछ यारों से मिलाती है,
जिसका थामना चाहता हूँ हाथ,
वो भीड़ में गुम हो जाती है!

ये ज़िन्दगी भी अजीब है, है ना?
जब चाहता हूँ अश्रू, तब ये हँसाती है,
जब-जब चाहता हूँ हँसना, तब-तब ये रुलाती है!

23 Jan 2012

गुमसुम सी ज़िन्दगी

गुमसुम है क्यूँ तू इतना,
ज़िन्दगी से इतना क्यूँ है खफा,
माना की बड़े हैं गम तेरे,
पर क्यूँ तू ये भूलता है,
उन गम के संग हम भी हैं तेरे,
इन गमों को तू कर दे मेरे!

रोक मत इस दिल-ए-नादाँ को,
मचलने दे इसे खुल कर ज़रा,
थोडा तू हस ले, थोडा तू मुस्कुरा,
माना की बड़े हैं गम तेरे,
पर क्यूँ तू ये भूलता है,
उन गम के संग हम भी हैं तेरे,
इन गमों को तू कर दे मेरे!

गुमसुम है क्यूँ तू इतना,
ज़िन्दगी से इतना क्यूँ है खफा!

11 Jan 2012

निगाहें


इन्सां तो देता लव्जों को ही तव्वजो,
मिला नहीं इन निगाहों को कोई कद्रदां.
इन निगाहों को कम मत समझ ऐ नादाँ,
बिन लव्जों के सब कुछ करें ये बयाँ!

दोस्ती


इकबाल-ए-प्यार की शुरुआत है दोस्ती,
गुल-ए-गुलज़ार, मौसम-ए-बहार है दोस्ती,
औरों का तो पता नहीं ए वक़्त,
पर इस नादां को ज़िन्दगी से प्यारी है दोस्ती!

इक खुशनसीब का मुकम्मल जहां है दोस्ती,
भरी बरसात का मौसम-खुशनुमा है दोस्ती,
औरों का तो पता नहीं ए वक़्त
पर इस नादाँ के लिए तो जिन्द है जहां है दोस्ती!

23 Mar 2011

हज़ारों ख्वाहिशें ऐसी!

तन से तो हम सभी हो गए हैं बड़े
पर मन सभी के अभी भी बालपन में हैं पड़े 
कुछ हसीं सपने इस बालमन ने हैं जड़े

चाहता है बालमन मेरा
माँ की गोद में सर रखकर सोना,
छोटी-छोटी बातों पर सिसक सिसक रोना!
पापा के कंधे पर मेले की वोह सैर,
कांटे भरी बेरी से चोरी किये बेर!
भैया के संग-संग, उन संकरी गलियों में क्रिकेट का खेल,
हवा में तैरती पतंगों का वो मेल!
छोटी बहना को आखरी आम के लिए सताना,
आइसक्रीम वाले की ट्रिंग-ट्रिंग सुनकर, वोह मन का ललचाना!

ए मित्र, चाहता है बालमन मेरा,
तुम्हारे शुष्क होंठों पर हंसी लाना!
चाहता है बालमन मेरा, ए प्रिये,
तुमको फिरसे गले लगाना! 

9 Feb 2011

चावल के दाने!!

हवा में उछाले चावल के दानों की तरह,
हम क्यूँ तितर-बितर हो गए,
जाने कहाँ मेरे यार खो गए,
हम तो इतने करीब थे, फिर भी क्यूँ हम तनहा हो गए
जाने कहाँ मेरे यार खो गए!!

21 Jun 2010

वो और मैं

वो.....
वो जो भी है
मुझे 
माने न माने
चाहे न चाहे 
फिर भी
मैं
अपने अस्तित्व की तलाश में भटकता 
मैं
उसे चाहता हूँ
उसे मानता हूँ
और चाहता रहूँगा !
लेकिन कब तक?
शायद, इस प्रश्न का उत्तर भी मेरे ही पास है
मैं उसे चाहता रहूँगा
यह ज़िन्दगी रहेगी तब तक
यह सांस चलेगी तब तक
अनंत को छूने की चाह रहेगी तब तक
और 
विश्वास मेरा कहता है ये कि
इस धरती के रुकने से पहले
इस अम्बर के झुकने से पहले 
वो.....
वो जो भी है
मुझे मानने लगेगी
मुझे चाहने लगेगी
और फिर
एक अस्तित्व के साथ जिऊँगा 
मैं
हसूंगा, मुस्कुराऊंगा 
सारे गमों को भूल जाऊँगा 
लेकिन 
क्या उसको मिलूंगा ?
क्या उसको पाऊंगा ?
क्या उसको प्यार दे पाऊँगा ?

प्रश्न तो हैं अनंत 
उत्तर है एक !
पर क्या है 
इस बार मैं नहीं जानता 
अफ़सोस !

धुंध

दिसम्बर की इक सर्द सुबह 
घर से बाहर जब मैं निकला
तो खुद को 
घनी धुंध से घिरा पाया |

उस घनी धुंध को देख
एक विचित्र सवाल मेरे मन में आया 
की
सूरज के बढ़ने के साथ घुल जायेगी धुंध
परन्तु 
कब निकलेगा सूरज मन का 
कब मिटेगी अहंकार की धुंध
कब मिटेगी मेरे मन से कनक की ये माया 
क्या कभी सुनूंगा निर्मल मन से 
कृष्ण की अमृत वाणी 
सुना भी अगर कभी कृष्ण को
तो 
क्या कभी करूँगा, सुना था जो मन ने मेरे 
इसके साथ ही सैर का समय हो गया था अंत  |

परन्तु अगली सुबह 
घर से बाहर जब मैं निकला 
तो अपने को
फिर उसी धुंध में घिरा पाया |

जीवन और मैं

जीवन एक राह है 
जीवन एक नाटक भी है
इस राह में कई राही हैं
इस नाटक मैं कई पात्र हैं
पर
हर पात्र की, हर राही की 
एक नई कहानी है !
उन पात्रों और राहियों में 
एक मैं भी हूँ 

मैं, अपने अस्तित्व को तलाशता मैं
कई राही मिले मुझे , कई पात्रों से मिला मैं 
आज तक भटक रहा हूँ
उस पात्र की तलाश में
जो मुझे अनंत तक पहुंचाएगा
वहां तक मेरा साथ न छोड़ेगा 
तीन तो मेरे को प्रभु की कृपा से मिले हैं 
उनमें से भी एक खो गया है

प्रभु तुम साथ न छोड़ना
तुमसे बस यह बिनती है 
इस तुच्छ  प्राणी की 
तुम हो तो आशा है 
वरना न तो मैं हूँ 
और न ही मेरा अस्तित्व !

शादी है बर्बादी

उफ़ ! ये शादी है बर्बादी
बड़े खर्चे ये है करवाती 
इससे बढती है आबादी 
हँसते लोगों को ये रुल्वाती |

उफ़ ! ये शादी है बर्बादी 
उलटे सीधे काम ये करवाती 
बेलन डंडे भी पड़वाती 
पापड  रोटी भी ये बिलवाती |

उफ़ ! ये शादी है बर्बादी !

ज़िन्दगी में


ज़िन्दगी में कुछ ऐसे लोग मिल जाते हैं,
जो दिल में धड़कन की तरह समा जाते हैं |
ज़िन्दगी में कुछ ऐसे लोग मिल जाते हैं,
जो छण मात्र में ही यादों की सौगात दे जाते हैं |
ज़िन्दगी में कुछ ऐसे लोग मिल जाते हैं,
जो हमारे गम में हमें हसाते हैं, हमारी ख़ुशी को दुगना बनाते हैं |
ज़िन्दगी में कुछ ऐसे लोग मिल जाते हैं,
जो उनके पीछे एक अटूट रिश्ता छोड़ जाते हैं |
ज़िन्दगी में कुछ ऐसे लोग मिल जाते हैं,
जो बंद होठों से सब कुछ बोल जाते हैं |
ज़िन्दगी में कुछ ऐसे लोग मिल जाते हैं,
जो हर कदम पर हमारा साथ निभाते हैं |

वो कुछ लोग हर किसी की ज़िन्दगी मैं आते हैं, 
वो कुछ लोग ही सच्चे दोस्त कहलाते हैं |

ज़िन्दगी में कुछ ऐसे लोग मिल जाते हैं |

18 Jun 2010

कोहरा



इक चादर मैली सी
ओड़ राखी है मैंने
और गहरे कोहरे गुमनामी की तरफ 
चला जा रहा हूँ तेजी से 
साथ कोई नहीं देता मेरा
फिर भी हाथ बढाता हूँ
शायद कोई थाम ले, पर जानता हूँ 
मुझसे बुरे व्यक्ति का अस्तित्व
नहीं है दुनिया में,
फिर भी क्या करूँ खुदा ने 
इक दिल जो दे दिया 
भावुक जो बना दिया 
इसलिए हमेशा चाहता हूँ साथ किसी का 
गलती की थी मैंने ये कि
मैं भूल गया था कि
दिखावट का ज़माना है
आज मेरी और सिर्फ मेरी वजह से 
सच दिखावट से हार गया 
लानत है मुझ पर 
इसलिए अब चाहता हूँ कि ये
कोहरा कभी न हटे, कोई मुझे पहचान न सके !

तन्हाई

इक तन्हा तन्हा सा मैं,
इक अलग अलग सा मैं,
इक अकेला अकेला सा मैं,
एक गुमनाम बदनाम सा मैं,
हर कहीं दुत्कार दिया जाता हूँ,
फिर क्यूँ दूसरों के पास जाता हूँ,
मुझसे दोस्ती करो, मेरे साथ रहो, 
लेकिन कौन सुनता है मेरी बात,
और इस तरह
एक तन्हा तन्हा सा मैं, 
और तन्हा हो जाता हूँ,
और तन्हा हो जाता हूँ |

मेरा साथी छूट गया !

प्रार्थना करी मंदिर में
फिर भी, रब रूठ गया 
मेरा साथी छूट गया !

कितनी करी कोशिश
फिर भी, दोस्ती का तार टूट गया
मेरा साथी छूट गया !

17 Jun 2010

इन आँखों में

मेरी आँखों में कुटिलता की इक झलक
मेरी आँखों में प्यार की इक चाहत 
मेरी आँखों में दोस्ती का जज़्बा
मेरी आँखों में लक्ष्य मेरा 
पर सबसे ऊपर
मेरी आँखों में बसता है एक तारा 
वो प्यारा सा नाम तुम्हारा !
वो प्यारा सा नाम तुम्हारा !

15 Jun 2010

इक पल में

इक पल में 
अपना सा लगता मैं पराया हो जाता हूँ |
इक पल में
नज़दीकियाँ दूरियों में तब्दील हो जाती हैं |
इक पल में
कोमलता कठोरता में बदल जाती है |
इक पल में
किसी को दोस्त बनाते बनाते दुश्मन बना बैठता हूँ |
ऐसा इसलिए है
क्यूंकि वोह इक पल मेरी ही किस्मत मैं लिखा है !

22 Mar 2007

वो

वो जीवन का आगाज़ भी,वो मौत की आवाज़ भी,
वो लिखी हुई किताब भी,वो अनकही बात भी,
वो सूरज की पहली किरण भी,वो डूबता चांद भी,
वो माटी की गुडीया भी,वो सोने की मूरत भी,
वो सागर सी अथाह भी,वो खतरों से आगाह भी,
वो वायु सी चंचल भी,वो पहाड़ सी अचल भी,
वो पानी सी सरल भी,वो पहाड़ सी कठोर भी,
वो क्रोध का अंगार भी,वो प्रेम् की बहार भी,
वो बंजर रेगिस्तान भी,वो हरा-भरा खेत भी,
वो गूंजता गीत भी,वो चीखती पुकार भी,
वो एक होशियार भी,वो बच्चे सी नादाँ भी,
वो एक मधुर एहसास भी,वो टूटा सा ख्वाब भी,
वो एक दोस्त भी,और साथ ही दुश्मन भी,
उसकी आंखों में एक आंसू भी,और चेहरे पर मुस्कान भी,
वो दिल के पास भी,वो मुझसे दूर भी,
ऐसी है वो,पर ना जाने कैसी है वो,
मेरी सबसे पिर्य मित्र,है वो.